Saturday, December 1, 2007

ढलती शाम (१९९८)


ढली है शाम हृदय जीत के
खड़ी है शाम स्मृति पटल पे
चली है शाम नयन सेज से
नाम है उसका ढलती शाम

वारिद के पंख फार-फराने को आए
किधर से आए किधर को जाए
छण मे श्वेत छण मे श्याम
छण मे वर्णविहीन हो जाए
ना स्वरूप ना गठन है उसका
दस दिशाओं धौरे जाए
विहरी आसमान का कहलाए
नाम है उसका वारिद शाम

ललाट की बिंदिया बुझती जाए
धुलती जाए चमक दुकूल की
कोने मे लगे कश्मीर की धरती
चित्रण उभरे हिमशिखर की
टूट के गिरती बरखा बूँदे
बन जाए अंत स्वाती दूब की
नाम है उसका ढलती शाम

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