Thursday, December 6, 2007

छण भंगुर-सा मन

बैठती शांत हूँ पर रहती अशांत हूँ
है छण भंगुर-सा मेरा मन

पल मे छण, छण मे पल, पल-छण, छण-पल
मन के मल्युद्ध में, पल मे नवीन, छण मे छीण
है कितनी मन मष्तिस्क की कल्पनाएँ नवीन
ये है मेरा छण भंगुर-सा मन

तरंग लाती है कभी सूनामी
तो कभी बैठ जाता है सुसुप्त हो के पानी
चुल-बुल चुल-बुल बुल-बुल बुल-बुल
दौरा भागा-सा भागाभागा-सा
है छण भंगुर-सा मेरा मन

समेत लेती हूँ असीम ब्रह्म को कभी अपने अंदर
तो कभी खो जाती हूँ नन्ही बूंदो के अंदर
खोजती ढूँढती, ख़ुद को आकांशाओं के दलदले में
पहुँच जाती हूँ कहीं गुमनाम शहर के किनारों पे
है छण भंगुर-सा मेरा मन

ख़ुद को समझ नही पति, कुच्छ कह नही पति
इसलिए कहती हूँ छण भंगुर-सा है मेरा मन

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